Saturday, July 31, 2010

धुंध

रह  गयी  थी  रूह  की  प्यास  बुझते  बुझते,
जब  तलक तेरे  रूह-ए -सुकून  को महसूस किया
चल  पड़ी थी कुर्बान  करने अपने  अरमान,
जब तलक तेरे जूनून-ए-इश्क को महसूस किया
धुंधला रह  गया था मंजिल का नज़ारा,
देखा करती है अब रुखसार-ए-साहिल आईने  में
जाने क्यों उम्मीद की  लो बुझे नहीं अभी तक,
जाने क्यों झूल रही है ज़िन्दगी मौत के मायने में

1 comments:

  1. jaise tu hamesha abstract likhata hai ...
    but haan angareji humko palle nahi padati
    haan hindi- urdu mein to ham ....
    चल पड़ी थी कुर्बान करने अपने अरमान,
    जब तलक तेरे जूनून-ए-इश्क को महसूस किया
    lines are heart-throbbing
    matlab dil tak utari hai ...

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